लोकसभा की रचना-Composition of Lok Sabha

केन्द्र सरकार के तीन अंग है
– 1. संसद ( व्यवस्थापिका ) 2. कार्यपालिका ( राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद व प्रधानमंत्री), 3. न्यापालिका ( सर्वोच्च न्यायालय )
भारतीय संसद – संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, संघ के लिए एक व्यवस्थापिका की व्यवस्था की गई है, जिसे संसद कहते हैं। यह व्यवस्थापिका दो सदनों ( उच्च सदन एवं निम्न सदन ) तथा राष्ट्रपति से मिलकर बनती है। भरतीय संसद के उच्च सदन को राज्यसभा एवं निम्न सदन को लोकसभा कहते हैं। इस प्रकार भरतीय व्यवस्थापिका द्धि- सदनात्मक हैं।
लोकसभा की रचना
निर्माण 13 अप्रेल 1952
प्रथम बेठक 13 मई 1952
लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष श्री गणेश वासु देव मावलंकर 15 मई 1952 से 27 फरवरी 1956
लोकसभा के वर्तमान अध्यक्ष श्री ओम विरला
लोकसभा के प्रथम उपाध्यक्ष श्री अनन्त कुमार अय्यर30 मई 1952 से मार्च 1956
लोकसभा के वर्तमान उपाध्यक्ष श्रीमती रमा देवी
अनुच्छेद 81 के अनुसार लोकसभा संसद का निम्न तथा लोकप्रिय सदन हैं। यह जनता का प्रतिनिधि सदन है। इसके सदस्य जनता द्वारा निर्वाचित होकर आते हैं। भारत के मूल संविधान में लिखा था कि लोकसभा में अधिक-से-अधिक 500 सदस्य होंगे। संविधान के 31 वे संशोधन द्वारा लोकसभा के सदस्यों की सख्या अधिकतम 550 निश्चित कर दी गई है, जिनमे से 20 सदस्यों की सख्या केंद्रशासित प्रदेशों के लिए निर्धारित की गई है। अतिरिक्त 2 सदस्य एंग्लो-इंडियन समुदाय के मनोनीत किए जाने की व्यवस्था है।
लोकसभा के सदस्यों का निर्वाचन-
लोकसभा सभा का सदस्य निर्वाचन होने के लिए आवश्यक है कि प्रत्याशी या उम्मीदवार भारत का नागरिक हो। वह 25 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो। वह लोकसभा के किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता हो और अन्य सभी अनिवार्य शर्तो को भी पूरा करता हो।
पागल, दिवालिया, विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त, लाभकारी सरकारी पद के स्वामी तथा विधि द्वारा अयोग्य व्यक्ति लोकसभा के सदस्य नही बन सकते हैं।


संविधान द्वारा लोकसभा के निर्वाचन में प्रत्येक वस्यक नागरिक को मतदान का अधिकार दिया गया है। भारत में वयस्क होने की आयु 18 वर्ष हैं। निर्वाचन के लिए सम्पूर्ण देश को निर्वाचन क्षेत्र में विभक्त कर दिया जाता है। इसके बाद प्रत्येक क्षेत्र के मतदाताओं की सूची तैयार की जाती है। निर्वाचन क्षेत्र बनाना निर्वाचन आयोग का कार्य होता है। निर्वाचन क्षेत्र इस प्रकार बनाए जाते हैं कि सभी निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या प्रायः समान हो प्रत्येक क्षेत्र में जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक वोट मिलते हैं, वह लोकसभा का सदस्य(सांसद) बन जाता है।
लोकसभा के सदस्यों को राज्यसभा के सदस्यों की भांति ही वेतन, भत्ते, पेंशन व अन्य सुविधाएं प्राप्त होती है।
कार्यकाल-
लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष है। प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति इस काल की समाप्ति के पूर्व भी लोकसभा भंग कर सकता है। संकटकालीन घोषणा की स्थिति में लोकसभा का कार्यकाल एक वर्ष और बढ़ाया जा सकता है। घोषणा की समाप्ति के बाद 6 माह के अंदर नई लोकसभा का चुनाव होना आवश्यक होता है।
अधिवेशन
लोकसभा का अधिवेशन राष्ट्रपति द्वारा बुलाया जाता है। इस सम्बंध में केवल यह नियम है कि लोकसभा की बैठकों में 6 माह से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए।
लोकसभा के सदस्यों के विशेषाधिकार –
लोकसभा के प्रत्येक सदस्य को स्वतंत्रतापूर्वक भाषण देने का अधिकार प्राप्त है। उसके भाषण के विरुद्ध न्यायालय में किसी भी प्रकार का मुकदमा दायर नही किया जा सकता। लोकसभा में दिए गए भाषण, तर्क-वितर्क अथवा रिपोर्ट को स्वयं प्रकाशित कर सकता है। अधिवेशन के दिनों में तथा अधिवेशन के 40 दिन पहले और 40 दिन बाद तक किसी दीवानी मुकदमे के कारण किसी सदस्य को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
लोकसभा के पदाधिकारी-
लोकसभा के सदस्य अपने मे से ही एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष चुनते हैं, किंतु वास्तव में प्रधानमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद की राय से अध्यक्ष पद के लिए किसी एक व्यक्ति के सम्बंध में निर्णय करता है। अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष अपने पद पर तब तक बने रहते हैं, जब तक लोकसभा का कार्यकाल स्वाभाविक रूप से समाप्त नहीं होता या लोकसभा भंग न कर दी जाए। अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को उनकी अवधि समाप्त होने के पूर्व भी उनके पद से हटाया जा सकता है, यदि लोकसभा के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से इस आशय का प्रस्ताव पारित हो जाता है। इस प्रकार के प्रस्ताव को प्रस्तुत करने के लिए 14 दिन पूर्व इसकी सूचना देनी आवश्यक है।
अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को संसद द्वारा निर्धारित वेतन तथा भत्ते मिलते हैं। लोकसभा के अध्यक्ष के कार्य बहुत महत्वपूर्ण एवं उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। वह लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है। लोकसभा में सदस्यों से नियमों का पालन करवाता है। लोकसभा के विषेशाधिकारो की रक्षा करता है। लोकसभा में शांति-व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखता है यदि कोई सदस्य सदन की कार्यवाही में अवरोध उत्पन्न करने का प्रयास करता है, तो अध्यक्ष उस सदस्य को सार्जेंटो की सहायता से सदन से बाहर निकलवा सकता है तथा उसे उस सत्र की कार्यवाही में भाग लेने से वंचित कर सकता है।यदि कोई सदस्य नियमों का उल्लंघन करता है, तो सभापति उसे सदन से बाहर भेज सकता है। संसद और राष्ट्रपति के समस्त पत्र-व्यवहार अध्यक्ष के माध्यम से ही होता है। उसकी अनुमति के बिना कोई भी सदस्य सदन में नही बोल सकता। लोकसभा अध्यक्ष ही यह निश्चित करता है कि लोकसभा में प्रस्तुत काम रोको प्रस्ताव


नियमपूर्वक हैं या नहीं अध्यक्ष ही अंतिम रूप से निर्णय करता है कि किन प्रश्नों या प्रस्तावों को या सदन की कार्यवाही से सम्बंधित बातो को स्वीकार किया जाए ओर किनको नही। सक्षेप में, वह सदन से सम्बंधित समस्त कार्यक्रम तथा कार्यवाही निश्चित करता है। वही यह निर्णय करता है कि कोई विधेयक वित्त-विधेयक हैं अथवा नहीं। जब कोई विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित हो जाता है तो अध्यक्ष ही उस पर अपने हस्ताक्षर करता है। बजट पर होने वाले भाषणों की सीमा वही निर्धारित करता है। सामान्यता वह मतदान में भाग नही लेता है, किन्तु बराबर मत होने की स्थिति में वह निर्णयक मत देता है। वह सदन की समितियों का पदेन सभापति होता है। प्रवर समितियों के सभापतियो को नियुक्त करता है। वह दोनों सदनों की सयुक्त बैठक की अध्यक्षता करता है।
लोकसभा की शक्तियां (अधिकार ) एवं कार्य
विधायी शक्तियां –साधारण विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है, किन्तु किसी भी विधेयक के कानून बनने से पूर्व उसे लोकसभा द्वारा पारित किया जाना अनिवार्य है। साधारणतया महत्वपूर्ण विधेयक प्रायः लोकसभा में ही प्रस्तुत किए जाते हैं। यदि कोई विधेयक राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया हो, तो उसका लोकसभा में पारित होना अति आवश्यक है।
वित्तीय-लोकसभा का वित्त विधेयकों पर पूर्ण अधिकार है। वित्त विधेयक राज्यसभा को केवल सिफारिश करने के लिए भेजे जाते हैं, जिन पर स्वीकृति प्रदान करने या अपनी स्वीकृति देने के लिए राज्यसभा को 14 दिन का समय दिया जाता है। यदि राज्यसभा 14 दिन तक विधेयक को अपनी सिफारिश के साथ वापस भेजती है, तो भी विधेयक मान लिया जाता है।
कार्यकारी-
केंद्रीय मंत्रिमंडल सामुहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है, उसका विश्वास खोने पर मंत्रिमंडल को त्याग-पत्र देना पड़ता है। यदि लोकसभा मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित कर देता है, तो मंत्रिमंडल को त्याग-पत्र देना होता है। लोकसभा के सदस्य मंत्रियों से प्रश्न ओर पूरक-प्रश्न पूछ सकते हैं तथा स्थगत-प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकते हैं।
विविध-
लोकसभा के सदस्य स्वयं अपने से ही अपने अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का चुनाव तो करते ही है, साथ-साथ लोकसभा के सदस्यों का राष्ट्रपति के निर्वाचन में बी योगदान रहता है। लोकसभा के सदस्य उप-राष्ट्रपति के निर्वाचन में भी भाग लेते हैं।
लोकसभा राज्यसभा के साथ संविधान के संशोधन में भी भाग लेती है। संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया से सम्बंधित विधेयक लोकसभा अथवा राज्यसभा किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है । संशोधन के प्रस्ताव को पारित होने के लिए यह आवश्यक है कि उसे संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग सदन की सम्पूर्ण सदस्य सख्या के बहुमत एवं उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से पारित होना चाहिए। यदि संविधान संशोधन विधेयक पर दोनों में मतभेद हो जाता है, तो सयुक्त अधिवेशन की व्यवस्था नही है।


राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही प्रस्तुत कर सकती हैं।यदि राज्यसभा इस संदर्भ में दोषारोपण करती है, तो उसकी जाँच लोकसभा करती है। यदि राज्यसभा उप-राष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव पारित करे तो उस पर लोकसभा की स्वीकृति भी आवश्यक है किन्तु लोकसभा उप-राष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव पारित नही कर सकती । यदि किसी संकटकाल में विभिन्न घोषणाओ को जारी रखाना आवश्यक ही है, तो उन पर लोकसभा की स्वीकृति आवश्यक है
लोकसभा के सदस्य जनता के प्रतिनिधि होते हैं और वे ही सामान्य जनता की वास्तविक कठनाइयों का सही ज्ञान रखते हैं। वे ही उनकी शिकायतें सरकार तक पहुँचते हैं और उसके दूर करने के लिए प्रयत्न करते हैं।